सीहोर जिले के कोसमी में आदिवासी परिवारों के मकान तोड़े जाने और खेतों को नुकसान पहुंचाने का विवाद अब सड़क से राजधानी तक पहुंच गया है। वन विकास निगम की कार्रवाई के विरोध में खिवनी अभयारण्य क्षेत्र के 35 से अधिक गांवों के हजारों आदिवासी न्याय की मांग लेकर भोपाल की ओर पदयात्रा कर रहे हैं। आंदोलनकारियों का ऐलान है कि वे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मुलाकात कर अपनी पीड़ा सुनाएंगे। उनकी मांग है कि बेदखल परिवारों को जमीन का पट्टा, उचित मुआवजा और पुनर्वास दिया जाए तथा कार्रवाई के जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कदम उठाए जाएं। इस आंदोलन ने वन भूमि पर कब्जे और आदिवासियों के अधिकारों को लेकर सरकार तथा प्रशासन के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
12 परिवारों के मकान टूटे, सड़क पर उतरा आदिवासी समाज
11 अक्टूबर को कोसमी में वन विभाग की कार्रवाई के दौरान 12 आदिवासी परिवारों के मकान तोड़े जाने और एक कुएं को मिट्टी से भर दिए जाने की बात सामने आई थी। इसके बाद गांव में लगातार धरना चला। प्रभावित परिवारों का आरोप है कि मकानों और खेती की जमीन पर कार्रवाई ने उनके सामने रहने, खाने और आजीविका का संकट खड़ा कर दिया है। अब यह विरोध केवल कोसमी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दूसरे गांवों के आदिवासी भी एकजुट होकर न्याय की मांग उठा रहे हैं।
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बैनर-तख्तियों के साथ भोपाल कूच, सरकार तक पहुंचाएंगे आवाज
पदयात्रा में महिलाएं, युवा, बुजुर्ग और पुरुष बड़ी संख्या में शामिल हैं। प्रदर्शनकारी हाथों में बैनर और तख्तियां लेकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। यात्रा में डीजे वाहन भी शामिल होने की जानकारी है, जबकि सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर पुलिस बल मौजूद है। आंदोलनकारियों का कहना है कि वे मुख्यमंत्री के सामने अपने कब्जे और खेती से संबंधित पुराने दस्तावेज रखेंगे तथा मांग करेंगे कि उनकी समस्याओं का समाधान केवल आश्वासनों से नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई से किया जाए।
शिवराज सिंह चौहान ने भी जताई थी कार्रवाई पर आपत्ति
कोसमी प्रकरण ने राजनीतिक रंग तब और गहरा कर लिया, जब केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान पीड़ित परिवारों से मिलने पहुंचे थे। सामने आई जानकारी के अनुसार, उन्होंने कार्रवाई पर कड़ी आपत्ति जताई थी और इसे अत्याचार की पराकाष्ठा बताया था। उनके हस्तक्षेप के बावजूद प्रभावित परिवारों की मांगों को लेकर आंदोलन का भोपाल तक पहुंचना सरकार के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौती बन गया है। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे रमेश बारेला का कहना है कि 12 परिवारों की बेदखली का मामला अब हजारों आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई बन चुका है।
पट्टा, मुआवजा और पुनर्वास-तीन प्रमुख मांगें
पदयात्रा में शामिल आदिवासी परिवारों ने तीन प्रमुख मांगें उठाई हैं। पहली, कार्रवाई के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की जांच कर दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई की जाए। दूसरी, जिस जमीन पर वे वर्षों से खेती करने का दावा कर रहे हैं, उससे जुड़े दस्तावेजों की जांच कर नियमानुसार उनके अधिकारों पर निर्णय लिया जाए। तीसरी, बेघर हुए परिवारों के लिए रहने, भोजन और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों की व्यवस्था की जाए तथा फसलों को हुए नुकसान का उचित मुआवजा दिया जाए।
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35 से अधिक गांवों में खेती रोकने का आरोप
आदिवासी नेताओं का आरोप है कि खिवनी अभयारण्य क्षेत्र के इटावा खुर्द, नवलगांव, भीलखेड़ा, कुरी, बसंतपुर और लावापानी सहित 35 से अधिक गांवों में खेती को लेकर दबाव बनाया जा रहा है। विदिशा जिले के ग्यारसपुर, लटेरी, सिरोंज और शमशाबाद क्षेत्रों से भी बेदखली तथा फसलें नष्ट किए जाने की शिकायतें सामने आने का दावा किया गया है। आंदोलनकारियों ने जून 2025 में खिवनी क्षेत्र में 50 से अधिक परिवारों के आशियाने उजाड़े जाने का भी आरोप लगाया है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
प्रशासन की रिपोर्ट में अतिक्रमण का दावा, आमने-सामने दो पक्ष
दूसरी ओर, वन विकास निगम और जिला प्रशासन की जांच रिपोर्ट में संबंधित जमीन पर कब्जे को अवैध बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2021 में 135 हेक्टेयर क्षेत्र में 3.37 लाख से अधिक सागौन के पौधे लगाए गए थे। आरोप है कि इनमें से 78,700 पौधे काटकर 31.48 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि पर अतिक्रमण किया गया। प्रशासन ने गूगल अर्थ की पुरानी तस्वीरों और ड्रोन वीडियोग्राफी का हवाला देते हुए दावा किया है कि जमीन पर 2022 से झोपड़ियां बनाकर खेती शुरू की गई। बेदखल परिवारों के मूल गांवों में पक्के मकान और मतदाता पहचान संबंधी रिकॉर्ड होने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है।
अब मुख्यमंत्री से मुलाकात पर टिकी निगाहें
एक ओर प्रशासन जमीन को आरक्षित वन क्षेत्र बताते हुए कार्रवाई को उचित ठहरा रहा है, तो दूसरी ओर आदिवासी परिवार पुराने दस्तावेजों और अपने अधिकारों का हवाला देकर न्याय मांग रहे हैं। ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष जांच, दस्तावेजों का सत्यापन और प्रभावित परिवारों की स्थिति पर संवेदनशील निर्णय महत्वपूर्ण है। अब निगाहें भोपाल में होने वाली संभावित मुलाकात और सरकार के रुख पर टिकी हैं। आदिवासियों का कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं होता, उनकी लड़ाई जारी रहेगी।
बैनर-तख्तियों के साथ भोपाल कूच