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महंगाई पर अमेरिकी फेड ने लिया बड़ा फैसला, अक्तूबर में आरबीआई की होगी अग्निपरीक्षा!

Sun, 20 Sep 2026 06:30 AM IST
Bhaskar Tiwari वीडियो डेस्क अमर उजाला डॉट कॉम

अमेरिकी फेडरल रिजर्व के हालिया सख्त रुख ने भारत में भी ब्याज दरों को लेकर बहस तेज कर दी है। 16 सितंबर 2026 को फेड ने अपनी नीतिगत ब्याज दर में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी कर इसे 3.75% से 4% के दायरे में कर दिया। फेड का यह फैसला सर्वसम्मत रहा और उसके नए अनुमानों में 2026 की महंगाई का अनुमान भी बढ़ाया गया है। सितंबर के अनुमानों के मुताबिक, फेड अधिकारियों का 2026 के लिए PCE महंगाई अनुमान 3.7% और फेडरल फंड्स रेट का साल के अंत का मध्य अनुमान 4.1% है। अधिकांश अधिकारियों के अनुमानों में 2026 में एक और दर बढ़ोतरी की गुंजाइश दिखाई देती है। 

फेड के इस रुख का असर भारत पर कई रास्तों से पड़ सकता है। सबसे अहम मुद्दा भारत और अमेरिका के बीच ब्याज दरों का अंतर है। अमेरिकी दरें ऊंची रहने पर डॉलर आधारित परिसंपत्तियों का आकर्षण बढ़ सकता है, जिससे उभरते बाजारों से पूंजी निकासी और स्थानीय मुद्राओं पर दबाव की स्थिति बन सकती है। भारत में भी रुपये पर दबाव दिखाई दे रहा है और 18 सितंबर को रुपया करीब 95.88 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ। बाजार में यह भी माना जा रहा है कि वैश्विक ब्याज दरों और कच्चे तेल की कीमतों की दिशा रुपये तथा भारतीय मौद्रिक नीति के लिए महत्वपूर्ण रहेगी। 

इसी बीच भारत की घरेलू महंगाई के आंकड़ों ने भी आरबीआई के सामने चुनौती बढ़ाई है। अगस्त 2026 में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.82% हो गई, जो जुलाई के 4.45% से अधिक है। खाद्य महंगाई भी 5.95% तक पहुंच गई। उपलब्ध विश्लेषणों के अनुसार, कोर महंगाई भी अगस्त में करीब 4.2% रही, जिससे यह संकेत मिलता है कि कीमतों का दबाव केवल खाद्य क्षेत्र तक सीमित नहीं है। 


कच्चे तेल की कीमतें भी आरबीआई के लिए अहम जोखिम हैं। वैश्विक ऊर्जा कीमतों में मजबूती भारत के आयात बिल और रुपये पर दबाव बढ़ा सकती है तथा इसका असर घरेलू महंगाई पर पड़ सकता है। इसके अलावा विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की निकासी भी बाजार और मुद्रा पर दबाव का एक स्रोत बनी हुई है। सितंबर के पहले हिस्से में ही भारतीय शेयर बाजार से एफपीआई की उल्लेखनीय निकासी दर्ज की गई थी। 

ऐसे माहौल में आरबीआई की अगली मौद्रिक नीति बैठक खास तौर पर महत्वपूर्ण हो गई है। आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति की अगली बैठक 5 से 7 अक्टूबर 2026 को प्रस्तावित है। हालांकि, फेड के फैसले के बाद यह कहना कि आरबीआई निश्चित रूप से ब्याज दर बढ़ाएगा, अभी जल्दबाजी होगी। आरबीआई के फैसले में घरेलू महंगाई, आर्थिक विकास, रुपये की स्थिति, वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें और वित्तीय बाजारों की परिस्थितियां सभी महत्वपूर्ण होंगी। इसलिए अक्टूबर की बैठक में बाजार की नजर सिर्फ रेपो रेट पर नहीं, बल्कि आरबीआई के रुख और आगे की मौद्रिक नीति के संकेतों पर भी रहेगी।

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