पैरालिसिस के मरीजों के लिए वरदान बनेगी यह तकनीक: बिना छुए-बोले चलेगा कंप्यूटर, मस्क ने बताए न्यूरालिंक के फीचर
एलन मस्क ने न्यूरालिंक के पहले प्रोडक्ट की जानकारी साझा की है। इसकी मदद से लोग सिर्फ सोचकर कंप्यूटर और दूसरे इंसानों से बात कर सकेंगे। मस्क ने दावा किया कि भविष्य में यह तकनीक पैरालिसिस से जूझ रहे लोगों को हाथ-पैर चलाने में भी मदद कर सकती है। इसी के साथ कंपनी स्पीच इंपेयरमेंट वाले लोगों के लिए नए फीचर्स और ग्राेक इंटीग्रेशन पर भी काम कर रही है।

विस्तार
सोचिए, आपको कंप्यूटर चलाने या किसी से बात करने के लिए न तो कीबोर्ड की जरूरत पड़े और न ही बोलने की। आप सिर्फ अपने दिमाग में सोचें और कंप्यूटर आपकी बात समझ जाए। एलन मस्क की कंपनी न्यूरालिंक कुछ ऐसी ही तकनीक पर काम कर रही है। मस्क ने कंपनी के पहले प्रोडक्ट टेलीपैथी के बारे में नई जानकारी भी साझा की है। उनका कहना है कि इसकी मदद से लोग सिर्फ सोचकर कंप्यूटर और दूसरे इंसानों से तेज रफ्तार में बातचीत कर सकेंगे।
न्यूरालिंक का पहला प्रोडक्ट टेलीपैथी क्या है?
- एलन मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर न्यूरालिंक के पहले प्रोडक्ट टेलीपैथी के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह तकनीक लोगों को सिर्फ सोचकर कंप्यूटर और दूसरे इंसानों से बातचीत करने की सुविधा देने के लिए बनाई गई है।
- मस्क ने न्यूरालिंक का पहले प्रोडक्ट को टेलीपैथी नाम दिया है। उनका कहना है कि यह सिर्फ सोचकर कंप्यूटर या इंसानों के साथ हाई-स्पीड कम्युनिकेशन संभव बनाता है। कुछ वर्षों में इसका आउटपुट बैंडविड्थ सबसे तेज ह्यूमन स्पीच और टाइपिंग से भी कहीं ज्यादा हो हो सकता है।
- इसका मतलब है कि न्यूरालिंक का लक्ष्य दिमाग से निकलने वाले सिग्नल के जरिए कंप्यूटर तक निर्देश पहुंचाना है। मस्क का दावा है कि भविष्य में इस तकनीक से बातचीत की रफ्तार इंसान के बोलने या टाइप करने की क्षमता से भी ज्यादा हो सकती है।
पैरालिसिस से जूझ रहे लोगों के लिए कैसे होगा मददगार?
- मस्क का कहना है कि कंपनी आने वाले वर्षों में दिमाग के मोटर और सेंसरी एरिया से निकलने वाले सिग्नल को शरीर के अंगों तक पहुंचाने के लिए काम कर सकती है। उन्होंने लिखा कि उम्मीद है कि कुछ वर्षों में हम दिमाग के मोटर और सेंसरी एरिया से सिग्नल को अंगों तक भेज पाएंगे, जिससे लोग फिर से अपने हाथों का इस्तेमाल कर सकेंगे और चल सकेंगे।
- मस्क के इस बयान के अनुसार, न्यूरालिंक का लक्ष्य भविष्य में इन सिग्नल को शरीर के अंगों तक पहुंचाने की तकनीक विकसित करना है। हालांकि, अभी यह सिर्फ संभावना है और इसे हासिल करने के लिए आगे रिसर्च और टेस्टिंग की जरूरत हो सकती है।
न्यूरालिंक ने अपनी तकनीक को बेहतर बनाने के लिए 72 घंटे के हैकथॉन का वीडियो भी शेयर किया है। इसमें कंपनी की टीम ने स्पीच इंपेयरमेंट यानी बोलने में परेशानी का सामना करने वाले लोगों के लिए ब्रेन सिग्नल के जरिए बातचीत को आसान बनाने वाले नए फीचर्स पर काम किया। इस दौरान तीन प्रमुख फीचर्स पर ध्यान दिया गया।
1. वॉइस एक्टिविटी डिटेक्शन सिस्टम
इस फीचर की मदद से सिस्टम खुद पहचान सकता है कि व्यक्ति कब बोलने की कोशिश कर रहा है। इसके लिए यूजर को हर बार कोई बटन दबाने की जरूरत नहीं होगी। यानी बोलने की कोशिश से जुड़े सिग्नल को सिस्टम अपने आप पहचानने का प्रयास करेगा।
2. विजुअल टूल्स
न्यूरालिंक के विजुअल टूल्स यूजर को यह समझने में मदद करेंगे कि किस तरह की कल्पना या इरादे से दिमाग में ज्यादा मजबूत सिग्नल पैदा हो रहे हैं। इससे यूजर को यह देखने में मदद मिलेगी कि कौन-से इमेजिन किए गए या इंटेंडेड एक्शन सिस्टम के लिए बेहतर तरीके से काम कर सकते हैं।
3. ग्रोक इंटीग्रेशन
कंपनी ने इसमें ग्रोक इंटीग्रेशन भी जोड़ा है। इसकी मदद से यूजर सोचकर Hey Neuralink कहकर ग्रोक एजेंट को एक्टिवेट कर सकता है और उसे अपना काम बता सकता है। यानी कि इसमें AI असिस्टेंट से काम कराने की सुविधा भी मिल सकती है।
न्यूरालिंक की तकनीक क्यों है खास?
न्यूरालिंक की ब्रेन-कंप्यूटर तकनीक की मदद से दिमाग और कंप्यूटर के बीच बातचीत हो सकती है। इससे उन लोगों को खास मदद मिलने की उम्मीद है, जिन्हें बोलने, टाइप करने या शरीर के अंगों को हिलाने में परेशानी होती है। ऐसे में टेलीपैथी के जरिए सिर्फ सोचकर कंप्यूटर से बातचीत करने का लक्ष्य एक खास हो सकता है।