Suncatcher: धरती छोड़ अंतरिक्ष में डेटा सेंटर क्यों बनाना चाहता है गूगल? जानिए क्या है प्रोजेक्ट 'सनकैचर'

नीतीश कुमार
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्लीनीतीश कुमार
Sun, 09 Nov 2025 12:05 PM IST
सार

एआई को बेहतर बनाने के लिए अब टेक कंपनियों की दौड़ अंतरिक्ष तक पहुंच गई है। गूगल ने अंतरिक्ष में सोलर-पावर्ड AI डेटा सेंटर बनाने की योजना का ऐलान किया है। कंपनी का यह प्रोजेक्ट ‘सनकैचर’ कहलाएगा, जिसके तहत 2027 में दो प्रोटोटाइप सैटेलाइट लॉन्च होंगे।

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2027 में लॉन्च होंगे प्रोटोटाइप - फोटो : AI

    विस्तार

    टेक दिग्गज गूगल अब धरती से परे जाकर अंतरिक्ष में डेटा सेंटर बनाने जा रही है। कंपनी ने घोषणा की है कि वह अंतरिक्ष में अपना पहला AI डेटा सेंटर बनाएगी। इस मिशन का नाम है ‘Project Suncatcher’, जिसे खुद CEO सुंदर पिचाई ने सोशल मीडिया पर शेयर किया।

    प्रोजेक्ट ‘सनकैचर’ क्या है और कैसे काम करेगा

    गूगल के इस रिसर्च प्रोजेक्ट के तहत कई छोटे-छोटे सैटेलाइट्स को लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) या सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट (SSO) में भेजा जाएगा, जहां हमेशा सूरज की रोशनी मिलती है। हर सैटेलाइट में सोलर पैनल और गूगल के ट्रिलियम TPUs (Tensor Processing Units) चिप्स लगाए जाएंगे, जिन्हें खास तौर पर AI ट्रेनिंग के लिए डिजाइन किया गया है।

    ये सभी सैटेलाइट्स आपस में फ्री-स्पेस ऑप्टिकल लिंक्स नाम की तकनीक से जुड़ेंगे, यानी लेजर लाइट के जरिए बिना तारों के हाई-स्पीड डेटा ट्रांसफर होगा। शुरुआती परीक्षणों में गूगल को 1.6 Tbps बायडायरेक्शनल स्पीड मिली है। कंपनी का कहना है कि 81 सैटेलाइट्स का क्लस्टर मात्र 1 किलोमीटर रेडियस में उड़ान भरेगा, जिससे डेटा ट्रांसफर तेज और स्थिर रहेगा।

    गूगल अंतरिक्ष में क्यों बन रहा डेटा सेंटर

    AI मॉडल्स को ट्रेन करने में भारी मात्रा में बिजली और ठंडक की जरूरत होती है। धरती पर बिजली, पानी और जमीन की सीमाओं के कारण यह मुश्किल होता जा रहा है। गूगल के सीनियर डायरेक्टर ट्रेविस बील्स के अनुसार, “सूरज हमारे सोलर सिस्टम का अल्टीमेट एनर्जी सोर्स है। यह धरती की कुल बिजली उत्पादन से 100 ट्रिलियन गुना ज्यादा ऊर्जा देता है।”

    अंतरिक्ष में नहीं होगी ऊर्जा की कमी
    अंतरिक्ष में नहीं होगी ऊर्जा की कमी - फोटो : AI

    स्पेस में सोलर पैनल 8 गुना ज्यादा प्रभावी होंगे और बिना रुकावट लगातार ऊर्जा देंगे। इससे कार्बन फुटप्रिंट कम होगा और एनवायरनमेंट पर दबाव भी घटेगा। गूगल का अनुमान है कि 2030 तक सैटेलाइट लॉन्च की लागत 200 डॉलर प्रति किलो (लगभग ₹17,700) रह जाएगी, जिससे स्पेस डेटा सेंटर बनाना धरती जितना ही सस्ता हो जाएगा।

    तकनीकी चुनौतियां भी कम नहीं

    स्पेस में सबसे बड़ी चुनौती रेडिएशन की है, जो चिप्स को नुकसान पहुंचा सकती है। इसे ध्यान में रखते हुए गूगल ने अपने Trillium TPUs को 67MeV प्रोटॉन बीम टेस्ट से गुजारा, जिसमें यह 15 krad(Si) तक रेडिएशन सहन करने में सक्षम पाए गए। हालांकि हाई बैंडविड्थ मेमोरी (HBM) अभी भी संवेदनशील है। सैटेलाइट्स को बहुत पास उड़ाना होगा ताकि ऑप्टिकल लिंक सही ढंग से काम करे। इसके लिए कंपनी हिल-क्लोहेसी-विल्टशायर इक्वेशंस और JAX मॉडल्स का इस्तेमाल करेगी।

    2027 में लॉन्च होंगे दो प्रोटोटाइप सैटेलाइट

    गूगल ने बताया कि 2027 की शुरुआत में वह Planet Labs के साथ साझेदारी में दो प्रोटोटाइप सैटेलाइट लॉन्च करेगी। इनसे ट्रिलियम TPU, ऑप्टिकल लिंक और मॉडल के परफॉर्मेंस की जांच की जाएगी। अगर यह परीक्षण सफल रहा, तो भविष्य में गिगावॉट स्केल सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन भी तैयार किए जाएंगे। यानी AI की ट्रेनिंग सीधे स्पेस से की जाएगी, जिससे धरती के संसाधन बचेंगे और AI प्रोसेसिंग सुपरफास्ट और सस्टेनेबल बन जाएगी।

    गूगल का ‘सनकैचर’ प्रोजेक्ट तकनीक की दुनिया में एक नई दिशा दिखा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह सफल होता है, तो 2035 तक स्पेस डेटा सेंटर्स हकीकत बन सकते हैं, जो न सिर्फ AI को और बेहतर बनाएंगे बल्कि पर्यावरण की रक्षा में भी मदद करेंगे।

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