समय-समाज से तीन चौथाई सदी से ज्यादा का अनुभव लेकर उसे आधी सदी से ज्यादा समय के साहित्य सृजन को समर्पित करने वाले दूधनाथ ने कथा लेखन, उपन्यास, आलोचना सहित साहित्य की अन्य विधाओं पर भी समान रूप से रचते हुए पूरी साफगोई से अपने समय की पड़ताल की।
नए संदर्भों में समय को सुनते-पढ़ते, उसका मूल्यांकन, पुनर्पाठ करते हुए निरंतर रचनारत दूधनाथ को देश के राजनीतिक मुद्दों पर तर्कपूर्ण राय जाहिर करते हुए, एक सक्रिय एक्टिविस्ट के रूप में हमेशा देखा गया।
‘आखिरी कलाम’ के एक वर्ष के भीतर तीन संस्करण निकले।
शुरुआत वर्ष 1959 में धर्मयुग में छपी पहली कहानी ‘तुमने तो कुछ नहीं कहा’ से हुई, पर इसी वर्ष लहर में प्रकाशित दूसरी कहानी ‘सपाट चेहरे वाला आदमी’ से वह चर्चित हुए। और रीछ, रक्तपात जैसी कहानियों से साठ के दशक की कहानी की सूरत बदली। कहानियों की रचनायात्रा के साथ ‘धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे, काशी नरेश से पूछो, माई का शोकगीत’आदि से फैंटेसी लेखक की छवि बदली।
सिर्फ बत्तीस बरस की उम्र में निराला की संपूर्ण कविताओं पर अत्यंत प्रामाणिक पुस्तक ‘निराला: आत्महंता आस्था’ लिखी। संस्मरण ‘लौट आ, ओ धार!’ में अद्भुत गद्य और प्रयोग सहित ‘तू-फू’ के बहाने कहानी के शिल्प में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप भी किया। ‘आखिरी कलाम’ पर पाठकों ने ऐसी मुहर लगाई कि एक वर्ष के भीतर इसके तीन संस्करण निकले।
इतना ही नहीं राजकमल ने साठ वर्ष में साठ महत्वपूर्ण पुस्तकों की सूची तैयार की तो पूरी ठसक के साथ उनकी पुस्तक ‘आखिरी कलाम’ भी शामिल रही। कविता, कथा, उपन्यास, आलोचना से इतर पौराणिक आख्यान पर आधारित नाटक ‘यमगाथा’ लिखा तो वह न सिर्फ सात भाषाओं में प्रकाशित बल्कि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय सहित अनेक मंचों पर जीवंत भी हुआ। किताबों से इतर ‘धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे’ पर डॉक्यूमेंट्री भी बनी।
जितने सहज, सरल रहे, उतने ही मुखर भी
लंबे रचनाकर्म के दौरान वह जितने सहज, सरल रहे, उतने ही मुखर भी। मुखरता इस हद तक कि कई बार अपनी बात रखते हुए उन्होंने इसकी परवाह नहीं की कि उसका उनकी सेहत और संबंधों पर क्या असर होगा।
वह बतौर अध्यापक जहां अत्यंत लोकप्रिय रहे, वहीं पारिवारिक जिम्मेदारियों का भी सफलतापूर्वक निर्वाह किया। साहित्य को जो कुछ दिया, उसके अतिरिक्त उनके सानिध्य में रचनाकारों की एक पूरी पीढ़ी तैयार हुई।
एक लेखक की जीवंतता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि जीवन के पचहत्तरवें वर्ष में, सिर्फ एक वर्ष के भीतर, उन्होंने शमशेर पर ‘एक शमशेर भी है’, लंबी भूमिका के साथ केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं का संकलन ‘ओट में खड़ा मैं बोलता हूं’, कहानी संग्रह ‘तू-फू’, भुवनेश्वर की समग्र रचनाओं पर ‘भुवनेेश्वर रचनावली’, मुक्तिबोध पर आधारित ‘अंत:करण का आयतन’ जैसी रचनाओं से साहित्य की दुनिया को समृद्ध किया।
8 वर्ष पहले