इस सावन क्या कह पाओगी?
जो न कही है, तुमने अब तक;
इस सावन क्या कह पाओगी? (1)
होंठ सिले हैं, लाज के मारे;
अँखियों की भाषा, पढ़ पाओगी? (2)
झुट्ठी-मुट्ठी, कुछ भी कह लो;
क्या मेरे बिन, रह पाओगी? (3)
दिल में है जो, जुबां से कह दो;
कब तक खुद को, भरमाओगी। (4)
कजरी, ठुमरी बहुत गा चुकी
गीत प्यार के, कब गाओगी? (5)
तुम मेरी, आँखों में देखो;
अपनी ही, सूरत पाओगी। (6)
वक्त फिसलता, रेत के मानिंद;
फिर एक दिन, तुम पछताओगी। (7)
बांध के रखा है, नयनों को;
खूब बरसेंगें, जब तुम जाओगी। (8)
सांझ-रात को, खूब भटक लो;
सुबह, 'सूरज' तक आओगी। (9)
विनय सिंह बैस 'सूरज'
जो न कही है, तुमने अब तक;
इस सावन क्या कह पाओगी? (1)
होंठ सिले हैं, लाज के मारे;
अँखियों की भाषा, पढ़ पाओगी? (2)
झुट्ठी-मुट्ठी, कुछ भी कह लो;
क्या मेरे बिन, रह पाओगी? (3)
दिल में है जो, जुबां से कह दो;
कब तक खुद को, भरमाओगी। (4)
कजरी, ठुमरी बहुत गा चुकी
गीत प्यार के, कब गाओगी? (5)
तुम मेरी, आँखों में देखो;
अपनी ही, सूरत पाओगी। (6)
वक्त फिसलता, रेत के मानिंद;
फिर एक दिन, तुम पछताओगी। (7)
बांध के रखा है, नयनों को;
खूब बरसेंगें, जब तुम जाओगी। (8)
सांझ-रात को, खूब भटक लो;
सुबह, 'सूरज' तक आओगी। (9)
विनय सिंह बैस 'सूरज'