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शब्दों में दृष्टि बाकी थी

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शब्दों में दृष्टि बाकी थी
        
                                                    
                            

चंद बरदाई की कलम उठी थी,
पृथ्वीराज की गाथा लिखती,
एक के हाथ में वीर धनुष था,
एक की कविता शौर्य सँजोती।
राजा के रण, कवि के अक्षर,
दोनों में इक झाँकी थी—
आँखें बुझीं तो क्या हुआ,
शब्दों में दृष्टि बाकी थी॥

पृथ्वीराज चौहान थे योद्धा,
चंद बरदाई सखा-कवि थे,
एक रणों में शौर्य जगाते,
एक उसी शौर्य की ध्वनि थे।
राजमुकुट से बढ़कर दोनों में,
मित्रता गहरी बाकी थी—
आँखें बुझीं तो क्या हुआ,
शब्दों में दृष्टि बाकी थी॥

तराइन की वह धूल उठी जब,
भाग्य की रेखा मुड़ी अचानक,
कल तक विजय जहाँ चरणों में,
वहीं पराजय खड़ी थी सम्मुख।
राज गया, पर टूट न पाया,
वीर हृदय में आग बाकी थी—
आँखें बुझीं तो क्या हुआ,
शब्दों में दृष्टि बाकी थी॥

टूटा सिंहासन, छूटा वैभव,
छूटा अपना राज और गौरव,
लोकगाथा फिर कथा सुनाती—
दृष्टिहीन थे वीर पृथ्वीराज।
बाहर चाहे रात उतर आई,
भीतर लेकिन भोर बाकी थी—
आँखें बुझीं तो क्या हुआ,
शब्दों में दृष्टि बाकी थी॥

बुझी आँखें, पर धनुष न भूला,
कान न भूले तीर का रास्ता,
शब्दभेदी का ज्ञान बचा था,
बस खो बैठा लक्ष्य का नक्शा।
दृष्टि गई थी आँखों वाली,
मन की दृष्टि अभी बाकी थी—
आँखें बुझीं तो क्या हुआ,
शब्दों में दृष्टि बाकी थी॥

मित्र की पीड़ा चंद ने जानी,
दूर देश की राह भी ठानी,
राजा था अब राजविहीन पर,
मित्र कहाँ पद देखता साथी?
जग ने चाहे पीठ दिखाई,
मित्र की निष्ठा बाकी थी—
आँखें बुझीं तो क्या हुआ,
शब्दों में दृष्टि बाकी थी॥

मौन सभा थी, लक्ष्य अनदेखा,
तना धनुष था, हाथ अकेला,
आँख नहीं तो दिशा कहाँ से?
यहीं खड़ा था मित्र सहारा।
जिसको दुनिया अंत समझती,
उसमें संभावना बाकी थी—
आँखें बुझीं तो क्या हुआ,
शब्दों में दृष्टि बाकी थी॥

चार बाँस, चौबीस गज की,
आठ अंगुल पहचान बताई,
“ता ऊपर सुलतान”—संकेत में,
चंद ने पूरी दिशा सुझाई।
शब्दों में जब लक्ष्य छिपा था,
दूरी भी उनमें आँकी थी—
आँखें बुझीं तो क्या हुआ,
शब्दों में दृष्टि बाकी थी॥

एक संकेत—चौहान समझे,
मित्र के अक्षर प्राण-से समझे,
आँख नहीं थी लक्ष्य देखने,
कानों ने संकेतों को पकड़ा।
तनी प्रत्यंचा बता रही थी,
मंज़िल मन ने झाँकी थी—
आँखें बुझीं तो क्या हुआ,
शब्दों में दृष्टि बाकी थी॥

तनी प्रत्यंचा, साँसें ठहरीं,
मौन सभा की धड़कन गहरी,
आँखों आगे लक्ष्य नहीं था,
कानों में बस दिशा थी ठहरी।
शब्द जहाँ तक राह बताते,
वहीं निशाने की झाँकी थी—
आँखें बुझीं तो क्या हुआ,
शब्दों में दृष्टि बाकी थी॥

लोकगाथा आगे कहती है—
शब्दभेदी फिर बाण चला था,
अपमानों से घायल राजा,
अंतिम क्षण भी नहीं झुका था।
सत्य-कथा की परतों से ऊपर,
स्वाभिमान की छाप बाकी थी—
आँखें बुझीं तो क्या हुआ,
शब्दों में दृष्टि बाकी थी॥

कलम अगर बस गीत लिखे तो,
उसका कितना धर्म निभेगा?
सुख में राजा पास रहे जो,
दुःख में क्या वह साथ चलेगा?
राजमुकुट तो छूट चुका था,
फिर भी मित्रता बाकी थी—
आँखें बुझीं तो क्या हुआ,
शब्दों में दृष्टि बाकी थी॥

तलवारें इतिहास बनातीं,
कलमें उसको उम्र दिलातीं,
वीर कभी रण में मरते हैं,
कविताएँ उनको लौटातीं।
देह समय के साथ गई पर,
शब्दों में वह झाँकी थी—
आँखें बुझीं तो क्या हुआ,
शब्दों में दृष्टि बाकी थी॥

आँखें छीनी जा सकती हैं,
दृष्टि कहाँ छीनी जाती है?
राज्य समय ले सकता है पर,
मित्रता कब मर पाती है?
एक के हाथ में बाण बचा था,
एक की दृष्टि बाकी थी—
आँखें बुझीं तो क्या हुआ,
शब्दों में दृष्टि बाकी थी॥
— संतोष कुमार शर्मा
 
7 घंटे पहले
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