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बच्चे न उसके भूख से तड़पे,बस उसकी ये लाचारी है।

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इधर उधर कुछ शांत खड़े है, कुछ के मन अकुलाते है।
        
                                                    
                            
बैठे बहुत है हाथ सेकने,अब पहुंचे और बेचारे है।
इधर उधर कुछ भभक रहा है,ये कैसा दुर्भाग्य है।
पास गया तो तपन बहुत थी, लगता है कि आग है।

कान में बाली बदन पे साड़ी, चेहरे पे उसके लाली है।
बैठे ताक में जिसके सब है, वह एक सुन्दर नारी है।
चेहरे पर उसके हसी खिली है, पर पैरो में छाले है।
कूद रही हैं पहन के घुंघरू, जिन पैरो में छाले है।

देखा उसके नयन भरे है ,आंखों में अंगारे है।
उसके तो कुछ बदन निहारे , कुछ उसपे दिल हारे है।
थकी-थकी है बुझी-बुझी है, बैठे ताक में सारे है।
कोई भी उसके दर्द न समझे, कुछ तो उसके ही सहारे है।

बैठा है उसका पति सामने, कहता है उसको प्यारी है।
वो भी उसका दर्द न समझे, ये कैसी अभागी नारी है?
आए जितने लोग यहां हैं, सबको यही पुकारा है।
यही नहीं की लोगों को ही, उसको भी यहां पर लाया है।

मै सोचा ये करती क्यों है?,लगता है कुछ हारी है?
सच बोलु मुझे है लगता ,पेट के भूख की मारी है।
तभी है करती आंख मिचौली, सर पर तो बोझा भरी है।
बच्चे न उसके भूख से तड़पे,बस उसकी ये लाचारी है।

                                                                                                                  
3 घंटे पहले
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