विज्ञापन

जटायु — हारकर भी जो जीत गया

User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जटायु — हारकर भी जो जीत गया
        
                                                    
                            

अरुण-पुत्र वह वीर जटायु,
संपाती का अनुज जटायु,
उम्र ढली, पर तेज न ढलता,
वन में रहता वीर जटायु।
दशरथ के थे सखा पुराने,
राम से पिता-सा नाता था—
तन भले ही हार गया,
धर्म मगर कब हारा था॥

पंचवटी में राम को देखा,
दशरथ का प्रतिबिंब-सा देखा,
“पुत्र! पिता का मित्र समझना”—
कहकर अपना परिचय देता।
सीता की रक्षा का वचन दे,
अपना धर्म निभाता था—
तन भले ही हार गया,
धर्म मगर कब हारा था॥

एक दिवस आकाश में देखा,
सीता का करुण क्रंदन देखा,
रावण उनको हर ले जाता,
उसने घोर अधर्म भी देखा।
वृद्ध पंख थे, तन दुर्बल था,
मन फिर भी ललकारा था—
तन भले ही हार गया,
धर्म मगर कब हारा था॥


रावण को आवाज़ लगाई,
“रुक जा!” कहकर राह रुकाई,
“राम-पत्नी को छोड़ अभी तू”—
धर्म की उसको याद दिलाई।
सामने लंका का राजा था,
फिर भी कब वह हारा था—
तन भले ही हार गया,
धर्म मगर कब हारा था॥


पंख पुराने, साहस नव था,
तन बूढ़ा था, मन दृढ़तर था,
रथ पर टूट पड़ा वह ऐसे,
मानो फिर यौवन लौटा था।
जीत सकेगा—यह न सोचा,
कर्तव्य ही बस प्यारा था—
तन भले ही हार गया,
धर्म मगर कब हारा था॥


चोंच चली, फिर पंजे बरसे,
रावण पर बन वज्र वे बरसे,
रथ को रोका, युद्ध किया वह,
क्षण भर को दसकंधर तरसे।
एक अकेला वृद्ध पक्षी,
अन्याय पर अंगारा था—
तन भले ही हार गया,
धर्म मगर कब हारा था॥


अंततः रावण वार कर गया,
दोनों पंखों को काट गया,
धरती पर जटायु गिरा तो,
रक्त धरा को लाल कर गया।
पंख कटे थे, प्राण बचे थे,
राम का ही सहारा था—
तन भले ही हार गया,
धर्म मगर कब हारा था॥


राम लौटकर सीता खोजें,
वन से पूछें, लता से पूछें,
धरती पर जब जटायु देखा,
दौड़ पड़े उस वीर की ओर।
टूट रही थी श्वास मगर भी,
वचन अभी तक प्यारा था—
तन भले ही हार गया,
धर्म मगर कब हारा था॥


“रावण दक्षिण दिशा गया है”—
इतना कहकर चैन मिला था,
जिस वचन को कभी दिया था,
आज उसे भी पूर्ण किया था।
प्राण गए प्रभु की गोदी में,
जीवन सफल सारा था—
तन भले ही हार गया,
धर्म मगर कब हारा था॥


राम ने उसको हृदय लगाया,
अश्रु बहाकर शीश झुकाया,
पिता-सखा को पिता-सा मानकर,
अंतिम संस्कार स्वयं कराया।
पक्षी था संसार की दृष्टि में,
राम को वह दुलारा था—
तन भले ही हार गया,
धर्म मगर कब हारा था॥

जीत सदा परिणाम नहीं है,
बल ही वीर की शान नहीं है,
अन्यायों के सम्मुख चुप रहना,
जीवन का सम्मान नहीं है।
जो निर्बल होकर भी लड़ जाए,
वही विजय का तारा था—
तन भले ही हार गया,
धर्म मगर कब हारा था॥

जटायु हमको यही सिखाता,
धर्म उम्र का भेद न मानता,
जीत मिले या हार मिले पर,
सत्य कभी पीछे न हटता।
रावण रण में जीत गया पर,
युग जटायु को गाता था—
तन भले ही हार गया,
धर्म मगर कब हारा था॥
— संतोष कुमार शर्मा
 
9 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Jagdish Prasad

514 कविताएं

View Profile

User

66 कविताएं

View Profile

Pankaj Sharma

1295 कविताएं

View Profile