विज्ञापन

आँधी की दौड़

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी आँधी की दौड़ में भागी मुक़ाम रह गया।
        
                                                    
                            
जिन्दगी जीने की जद्दोजहद में काम रह गया।।

फुर्सत के पलों में ख्यालो से संघर्ष ज्यादा रहा।
चाह की तलाश में खामख्वाह आराम रह गया।।

निर्णय के पीछे वक्त गुजरने का डर कुलबुलाया।
आखिरकार निर्णय लिया दिल का दाम रह गया।।

हर लम्हा कैद करने की कोशिश अधूरी रह गई।
सादगी से सुसज्जित बेफिजूल इल्ज़ाम रह गया।।

दुसरों की जिन्दगी से अपनी तौलते रहे 'उपदेश'।
जो मिला कुबूल उसमें खुशी का शाम रह गया।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile