बाप को यार के क़दमों पे झुका देती है,
इश्क़ की आग में घर-बार जला देती है।
राम कैसे सिया की लाज बचा पाएँगे?
आज सीता ही लखन-रेखा मिटा देती है।
— त्रिशिका धरा