अगर आपको सिर्फ़ पैरों में बंधी ज़ंजीरें ही बेड़ियाँ नज़र आती हैं,
तो शायद आपने आज़ादी का असली अर्थ समझा ही नहीं।
परंपरा और संस्कार के नाम पर
चारदीवारी में कैद कर दी गई ज़िंदगी भी एक बेड़ी है,
बस उसका कोई ताला दिखाई नहीं देता।
अगर आपको सिर्फ़ पक्षी का दड़बा ही पिंजरा लगता है,
तो शायद आपने एक पुरुष को भी देखा नहीं—
जो ज़िम्मेदारियों के बोझ तले
अपनी जवानी, अपने सपने और अपनी इच्छाएँ
चुपचाप कुर्बान कर देता है।
हर कैद की सलाखें लोहे की नहीं होतीं,
कुछ सलाखें रिश्तों, परंपराओं और ज़िम्मेदारियों की भी होती हैं।
— सूर्यान्श रीतमा