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न उतारो परिधान खुले में

Suresh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हमाम हो या बेडरूम, रहे नंगे सही।
        
                                                    
                            
समाज की इज़्ज़त, तो कपड़ा यही।

न उतारो खुले में यूँ परिधान कभी।
बीबी एक समाज मे,माँ बहन सभी।

कहने को यत्र नार्यस्तु पुज्यन्ते कहा।
मगर जीवन तो है बेड़ियों में जकड़ा।

गुनाह के सरगना न डरे खुदा से भी।
डरना भी नारी नसीब में रहा लिखा।

कब तक डर दिल को सालता रहेगा।
कब मन मक्कम हथियार उठाएगा।

कुर्दिश महिलाओं की सेना सजेगी।
कोने कोने से आतंकी पनाह मांगेगा।

अब और नही लाचार जीवन न होगा।
समाज ये समाज पुरुष प्रधान न होगा।

क्यों छुपना पड़ता नारी को समाज मे।
जो डरमुक्त आदरयुक्त जीवन न होगा।
2 महीने पहले
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