बीच नदी के
गर्भ तक जा पहुँचा
रेत के टीलो पर चढ़कर ,
जहाँ डूब जाना तय था कभी
गहरी नदी के जल में
जाना भी भला कौन चाहता
उस भय में ?
भरी होती अगर ,
पर खामोशी लिये है देखो
आज अपनेपन में
निज व्यथा किसे सुनायें ?
और कितना जगाये
मानो सब सोये पड़े हो
गहरी नींद में ,
किसे उठाये ?
हाँ ! लुप्त होते देखा
गंगा नदी के जल को
जो लबालब बहती थी कभी
हर मौसम में,
बिना छोडें़
रेत की आहट ॥
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