इकट्ठा करता हूँ
अपनी हार को सम्भाल कर ,
मन की गठरी में
कस कर बाँधकर ,
ढोता हूँ हर दिन
बोझ कि तरह
सच कहूँ तो
जिसे उतारना नही चाहता ,
क्योंकि जिद मेरी भी हैं
भार पर भार लाद लेने की
संघर्ष पथ पर
जीने- मर जाने की ,
जबतक की पाई -पाई
का हिसाब न मिल जाये
मुझे अपनी मंजिल से ॥
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