कभी शोर मचाती थी
आँगन में आ -आकर
चिड़िया
छपर जाती सुखवन पर
तितर -बितर कर
अन्न के दाने
मस्ती लिये एक अल्हड़पन में
खेलती -कभी झगड़ती
खूब कोलाहल लिये
आँगन में
खड़ा कर देती थी माँ कभी
एक पतली डंडी थमाकर हाथों में
जब मानती नहीं थी
उपद्रव करती
चिड़िया
पेट भर जाने के बाद भी
अठखेलियां करती !
अब उदास सा रहता हैं मन आँगन
कभी माँ हैं कहती
गौरैयाओं के बिना ,
मानो बिटिया की तरह
ब्याही हो चली सब
छोड़कर कर सुना -सुना
घर -आँगन ॥
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