झर-झर निर्झर जल का सोता ।
झर-झर शीतल मन का होता ।।
यह फूट पड़ा भू छाती से।
पर्वतमाला की घाटी से ।।
निर्झर शिव की उलझ जटा से।
कल-कल करता बहे सदा से ।।
डूबधार यह पावन गोता ।
झर-झर निर्झर जल का सोता ।।
यह जल जीवन आ धरती पर।
लगा दुग्ध सा उज्ज्वल होकर ।।
कण-कण में भर दे तरूणाई ।
नव जीवन की प्यास बुझाई ।।
गाँव-शहर सब घर ले जाता ।
झर-झर निर्झर जल का सोता ।।
यह जल औषधि है अमृतमय ।
दे निदान रोगों से निर्भय ।।
गठिया,गैंस दवा हो जैसे-
सुबह-शाम जल पीलो वैसे ।।
जो जन पीता,कभी न रोता ।
झर-झर निर्झर जल का सोता ।।
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