अस्सी के दशक में जीना है अब,रील्स-ट्रेंड करते रहते हैं
माकूल ज़माने में हम भी, रोज़ तरस खाकर कहते हैं—
वो ख़त का अब इंतज़ार कहाँ है,
मिलने का इतवार कहाँ है।
बातों में जो अपनापन था,
अब वैसा किरदार कहाँ है।
तस्वीरें कम थीं,यादें ज़्यादा,
दिल का तब बाज़ार कहाँ था।
अस्सी के दशक में जीना है,
बस इतना-सा ख़ुमार बना है
वो चिट्ठियों की ख़ुशबू लौटाओ
बीते ख़त फिर से पढ़वाओ।
दो पल बैठो आमने-सामने,
बिन मोबाइल के वक़्त बिताओ।
तस्वीरों में कैद न थे हम,
यादों में आबाद हुआ करते थे।
कम चीज़ों में खुश रहते थे,
पर दिल से ज़्यादा जिया करते थे।
हर लम्हा अब पोस्ट हुआ है,
हर रिश्ता जैसे होस्ट हुआ है।
दिखने को सब पास खड़े हैं,
फिर भी मन क्यों दूर हुआ है?
अस्सी के दशक में जीना है,
तो थोड़ा बचपन वापस लाओ।
दुनिया चाहे रील बना ले,
तुम जीवन जी कर दिखलाओ।
~शशि भूषण