आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बिन मोबाइल के वक़्त बिताओ।

                
                                                         
                            अस्सी के दशक में जीना है अब,रील्स-ट्रेंड करते रहते हैं
                                                                 
                            
माकूल ज़माने में हम भी, रोज़ तरस खाकर कहते हैं—

वो ख़त का अब इंतज़ार कहाँ है,
मिलने का इतवार कहाँ है।
बातों में जो अपनापन था,
अब वैसा किरदार कहाँ है।

तस्वीरें कम थीं,यादें ज़्यादा,
दिल का तब बाज़ार कहाँ था।
अस्सी के दशक में जीना है,
बस इतना-सा ख़ुमार बना है

वो चिट्ठियों की ख़ुशबू लौटाओ
बीते ख़त फिर से पढ़वाओ।
दो पल बैठो आमने-सामने,
बिन मोबाइल के वक़्त बिताओ।

तस्वीरों में कैद न थे हम,
यादों में आबाद हुआ करते थे।
कम चीज़ों में खुश रहते थे,
पर दिल से ज़्यादा जिया करते थे।

हर लम्हा अब पोस्ट हुआ है,
हर रिश्ता जैसे होस्ट हुआ है।
दिखने को सब पास खड़े हैं,
फिर भी मन क्यों दूर हुआ है?

अस्सी के दशक में जीना है,
तो थोड़ा बचपन वापस लाओ।
दुनिया चाहे रील बना ले,
तुम जीवन जी कर दिखलाओ।
~शशि भूषण
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
13 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर