विज्ञापन

तारों की बारात : प्रतीकात्मक–दार्शनिक मुक्तछंद कविता

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज नभ की नील देहरी पर
        
                                                    
                            
किसने दीप सजाए हैं?

किस अदृश्य निमंत्रण पर
अनंत दिशाओं से चलकर
तारों की बारात आई है?

न कोई रथ दिखाई देता है,
न घोड़ों की टाप सुनाई देती है,
फिर भी आकाश की निस्तब्ध वीणा पर
कोई अनाहत मंगलगान बज रहा है।

चंद्रमा मौन पुरोहित-सा
इस दिव्य यात्रा का साक्षी है,
और रात्रि ने
श्यामल आँचल में
असंख्य ज्योति-कण सँजो रखे हैं।

हर तारा
मानो चेतना का एक अक्षर है,
हर झिलमिलाहट
किसी अनादि मंत्र की मात्रा,
हर नक्षत्र
ब्रह्मांड के मौन ग्रंथ का
एक प्रकाशित अध्याय।

मैं देर तक देखता हूँ—
कितनी दूर हैं ये तारे,
फिर भी कितने निकट!

शायद दूरी आकाश में नहीं,
हमारी दृष्टि में होती है।

शायद प्रकाश कभी दूर नहीं जाता,
हम ही अपनी पलकों पर
अंधकार का आवरण रख लेते हैं।

एक तारा टिमटिमाता है—
जैसे कोई भूली हुई आत्मा
अपने मूल-स्रोत को पुकार रही हो।

दूसरा स्थिर है—
जैसे समाधिस्थ ऋषि
स्वयं में स्थित होकर
संपूर्ण दिशाओं को आलोकित कर रहा हो।

तीसरा टूटकर
अंधकार में विलीन हो जाता है।

क्षणभर को
आकाश की देह काँपती है,
फिर सब कुछ पूर्ववत्।

पर मेरे भीतर
एक प्रश्न जन्म लेता है—

क्या टूटना ही अंत है?

या प्रकाश का
एक रूप से दूसरे रूप में
प्रवेश करना ही
जिसे हम अंत कहते हैं?

तभी लगता है—
यह बारात तारों की नहीं,
हम सबकी है।

कोई जन्म बनकर आया है,
कोई कर्म बनकर चला है,
कोई स्वप्न है,
कोई स्मृति,
कोई अधूरा प्रश्न,
कोई उत्तर की प्रतीक्षा में जलता
मौन दीप।

हम सब
अपने-अपने नक्षत्र लेकर
समय के आकाश में घूम रहे हैं,
और खोज रहे हैं
उस एक ध्रुव को
जो स्वयं कहीं नहीं जाता,
पर जिसकी उपस्थिति से
सारी दिशाएँ अर्थ पाती हैं।

शायद वही परमज्योति है—
जिससे तारों ने प्रकाश पाया,
जिससे चेतना ने स्पंदन पाया,
जिससे जीवन ने अर्थ पाया।

रात्रि गहरी होती जाती है।

अब आकाश
आकाश नहीं लगता—
वह मेरे भीतर खुला हुआ
एक विराट अंतरिक्ष है।

तारे बाहर नहीं चमकते,
वे भीतर उतरते हैं।

नक्षत्र आँखों में नहीं,
चेतना में बनते हैं।

और तब
बारात का रहस्य खुलता है—

दूल्हा कोई दूसरा नहीं,
वह प्रकाश ही है;

बाराती कोई दूसरे नहीं,
हम स्वयं हैं;

मार्ग कोई बाहर नहीं,
वह अंतःकरण है;

और विवाह—
जहाँ ‘मैं’ की अंतिम सीमा
मौन होकर मिटती है,
जहाँ चेतना
अपने ही अनंत आकाश को
पहचान लेती है।

पूर्व दिशा में
प्रभात की पहली अरुणिमा फूटती है।

एक-एक करके
तारे ओझल होने लगते हैं।

पर आश्चर्य!

आकाश खाली नहीं हुआ—
उनकी ज्योति
सूर्योदय में विलीन हो गई है।

तब समझ में आता है—

तारे मिटते नहीं,
वे अपने बड़े प्रकाश में
अपना छोटा प्रकाश समर्पित करते हैं।

शायद मुक्ति भी यही है—
स्वयं को खोना नहीं,
अपने छोटे ‘मैं’ को
उस विराट ‘मैं’ में
पहचान लेना।

रात्रि विदा होती है,
पर मेरे भीतर
एक आकाश जागता रहता है।

अब जब भी
रात उतरती है,
मैं ऊपर नहीं देखता—

मैं भीतर देखता हूँ।

क्योंकि जान चुका हूँ—

तारों की बारात
हर रात नभ में नहीं आती;

वह उस हृदय में उतरती है
जहाँ अंधकार भी
प्रकाश का संकेत बन जाए,
और आँखें
बाहर के तारों से आगे
अपने भीतर के आकाश को
देखने लगें।
- सनातन मुकुंद
9 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all