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अदृश्य की अनुगूँज : दार्शनिक–अन्योक्ति मुक्तछंद

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बंद किवाड़ पर
        
                                                    
                            
किसने दस्तक रख दी—
घर सोता रहा,
पर कुंडी
भीतर से काँपती रही।

कुएँ की अँधेरी आँख में
आकाश उतर आया;
जल ने
अपना चेहरा नहीं देखा।

सूखी नदी
रेत की नसों में
किस सागर का मंत्र
जपती रही—
प्यास ही जानती थी।

एक बीज
मिट्टी की निस्तब्ध समाधि में
अपना वन
अँधेरे में सँजोए रहा।

वृक्ष उगा—
पर किसी ने नहीं देखा
उसकी पहली जड़
किस अंधकार में
किस प्रकाश को
सँजो रही थी।

शंख अधरों से लगा—
नाद कहीं नहीं था;
फिर भी
समुद्र की अनंत दूरियाँ
भीतर कहीं काँप उठीं।

दीप जलता रहा—
दीवार पर
उसकी छाया बढ़ती गई।

लौ छोटी थी,
छाया अनंत।

रात ने
चंद्रमा को ढँक लिया;
चंद्रमा ने
रात को नहीं।

दर्पण दीवार पर टँगा रहा—
चेहरे आते गए,
चेहरे जाते गए;
पर दर्पण के भीतर
जो देखता था,
उसका कोई चेहरा नहीं था।

मैंने अपनी परछाईं से पूछा—
“तू किसके पीछे चलती है?”

वह कुछ नहीं बोली।

सूर्य ढला—
और वह
मेरे ही चरणों में
विलीन हो गई।

उस रात
कोई दीप नहीं जला।

फिर भी
अँधेरे की तह में
एक अनाम आभा
धीरे-धीरे खुलती रही—

न कोई रूप,
न कोई नाम,
न कोई दिशा।

केवल
एक अनाम स्पंदन—
जो दिखाई नहीं देता था,

जिसकी अनुगूँज से
दृश्य जगत
अपनी आँखें खोलता था।

और तब—
खोज समाप्त नहीं हुई;

खोजने वाला ही
धीरे-धीरे
खोज से विलीन हो गया।

रह गया केवल—

वह मौन,
जिसमें
दृश्य की प्रत्येक रेखा
अदृश्य की ओर
झुकती है।

— श्री सनातन मुकुंद
22 घंटे पहले
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