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मैं ख़ुद को लिखता हूं भटकता मुसाफ़िर तुझे मैं अपना रहनुमा लिख रहा हूं

Şhahnawaz Pahat

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            खून ए ज़िगर से मैं खत लिख रहा हूं
        
                                                    
                            
मैं इक ग़ज़ल खुशनुमा लिख रहा हूं

मैं ख़ुद को लिखता हूं भटकता मुसाफ़िर
तुझे मैं अपना रहनुमा लिख रहा हूं

लिखता हूं तुझको मैं रश्क़े क़मर
ख़ुद को मैं दाग ए क़मर
दाग़ ए बदनुमा लिख रहा हूं

तू मलिका ए हुस्नो जमालो सल्तनत है
मैं ख़ुद को ग़ुलामे सल्तनत लिख रहा हूं

ख़ुद को मैं प्यासी जमीं लिख रहा हूं
तुझे बरसता हुआ आसमाँ लिख रहा हूं

ख़ुद को मैं कुछ भी नहीं लिख रहा
और तुझ को मैं सारा जहां लिख रहा हूं
-अश्क़ फतेहपुरी
एक महीने पहले
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