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लाखों देवता की ये जननी

Anonymous User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            लाखों देवता की ये जननी, पावनता का धाम हैं।
        
                                                    
                            
हैं भारत माता ये अपनी, हम इसकी संतान हैं।

गंगा, यमुना और कावेरी, की नित बहती धार हैं।
कहीं धान की खेती होती, विशालकाय कहीं थार हैं।
रंग - बिरंगे फूल खिले हैं, चौड़ा कहीं मैदान हैं।
हैं भारत माता ये अपनी, हम इसकी संतान हैं।

तुलसी,मीरा पदों संग, कबीर की वाणी बजती है।
होली, राखी और दीवाली, धरा दुल्हन सी सजती हैं।
नित सांझ को सूरज ढलता, करता इसे प्रणाम हैं।
हैं भारत माता ये अपनी, हम इसकी संतान हैं।

हिंदु, मुस्लिम, सिख, ईसाई, का यहां पे बसेरा है।
सद्भावना से सब रहते, चांद सूरज का पहरा है।
बच्चा-बच्चा इसको पूजे, विवेकानंद का ज्ञान हैं।
हैं भारत माता ये अपनी, हम इसकी संतान हैं।

पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण, अलग-अलग है भाषाएं।
मुख कश्मीर मनोरम लगता, केश वृक्ष की शाखाएं।
चरण चुमने सागर आता, संत यहां की शान हैं।
हैं भारत माता ये अपनी, हम इसकी संतान हैं।

पद्मावती ने जौहर को, हंसते हुए अपनाया हैं।
भिड़ चली गौरों से लक्ष्मी, मार के दूर भगाया हैं।
देश के खातिर बेटा वारा, चन्दन का बलिदान हैं।
हैं भारत माता ये अपनी, हम इसकी संतान हैं।

महाराणा प्रताप, शिवा जी ने आजादी समझाई।
राजगुरु सुखदेव भगत सिंह, ने भी फांसी अपनाई।
हर युवा फ़ौलादी यहां पर, ये वीरों की ख़ान हैं।
हैं भारत माता ये अपनी, हम इसकी संतान हैं।

इसके दीवाने फ़ौजी बनकर, पहरा देते रहते हैं।
सर्दी, गर्मी, बरसातों को, हंसते - हंसते सहते हैं।
झुक न पाए कभी तिरंगा, देने पड़े चाहे प्राण हैं।
हैं भारत माता ये अपनी, हम इसकी संतान हैं।

लाखों देवता की ये जननी, पावनता का धाम हैं।
हैं भारत माता ये अपनी, हम इसकी संतान हैं।
एक वर्ष पहले
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