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लड़खड़ाए वादियों में गिर संभल रहा ये दिल

सत्यवान कुश्वाहा

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            लड़खड़ाए वादियों में गिर संभल रहा ये दिल
        
                                                    
                            
ख्वाब तितलियों का ये जो ले के चल रहा ये दिल

कूंकती ए वादियां, ए घाटियां नदी पहाड़
तेरे हुस्न-ओ-शबाब पर फिसल रहा ये दिल

सुन खिली कली तुझे जवान होते देख कर
रूप दिन-ब-दिन तेरी तरह बदल रहा ये दिल

झील सी निगाह तेरी एक बार क्या मिली
हर तेरी अदा पे आज तक मचल रहा ये दिल

खुशबुओं सी वस्ल जो कभी तेरी नसीब थी
आज दूसरों के संग है तो जल रहा ये दिल

खुद-ब-खुद नहीं हुआ शब-ए-फिराक रूह से
पी ली शब-ए-वस्ल में तो हाथ मल रहा ये दिल

सर्दियों में धूप सेकती दिखी जिधर कली
झांकता उसी गली में फिर से छल रहा ये दिल
3 वर्ष पहले
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