विज्ञापन

वीर 'अभिनंदन' को वो रोक न पाया..

Rajeev Nayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            समुंद्र सरीखे पर्वतमाला
        
                                                    
                            
लांघ वीर अरि सम्मुख अड़ा
देख रौद्र रूप भागा कायर
बांध कफ़न तीन रंगों का
निडर हो वो पीछे पड़ा
अस्त्र अचूक प्रहार किया
दुष्ट बना अग्नि का गोला
सीधा नभ से धरती पे गिरा
रथ डोला वीर का जब
परिणाम बताने,अरि भूमि पर पग धरा
शत्रु को शक्ति का एहसास दिलाया
निज साहस से परिचय कराया
बेख़ौफ़ खड़ा वो सीना ताने
दृढ़ता का संकल्प दोहराया
आभास हुआ विध्वंस का जब
दुश्मन थर-थर घबराया
शीश झुकाकर हार स्वीकारा
वीर 'अभिनंदन' को वो रोक न पाया।।
~राजीव नयन

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
7 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all