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वीर 'अभिनंदन' को वो रोक न पाया..

                
                                                         
                            समुंद्र सरीखे पर्वतमाला
                                                                 
                            
लांघ वीर अरि सम्मुख अड़ा
देख रौद्र रूप भागा कायर
बांध कफ़न तीन रंगों का
निडर हो वो पीछे पड़ा
अस्त्र अचूक प्रहार किया
दुष्ट बना अग्नि का गोला
सीधा नभ से धरती पे गिरा
रथ डोला वीर का जब
परिणाम बताने,अरि भूमि पर पग धरा
शत्रु को शक्ति का एहसास दिलाया
निज साहस से परिचय कराया
बेख़ौफ़ खड़ा वो सीना ताने
दृढ़ता का संकल्प दोहराया
आभास हुआ विध्वंस का जब
दुश्मन थर-थर घबराया
शीश झुकाकर हार स्वीकारा
वीर 'अभिनंदन' को वो रोक न पाया।।
~राजीव नयन

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7 वर्ष पहले

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