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अंदाज़ ए रस्म ए उल्फत

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अपनी ही नाकामियों का जश्न मैं मना रहा हूं चल के अजनबी शहर के अजनबी राहों पर उलझनें अपनी बढ़ा रहा हूं
        
                                                    
                            
ना रहा आसान कभी गिला तुमसे करना बढ़ा कर हम मुश्किलें अपनी ही होकर बर्बाद तुमसे अब फासला बढ़ा रहा हूं
सितम ये सामने आपके जिक्र अपनी मुफलिसी का कर सकता मैं नहीं गवां कर वक्त तेरे ही इंतजार में दर्द बढ़ा रहा हूं
करके भरोसा फिर भी किया अहसान मुझ पर कब सच तो है ये बगैर तेरी मर्जी के मिला सकूं कब सोच के घबरा रहा हूं
उदासियां भी अब चैन ओ सकूं से जीने हमें ना देगी बढ़ा कर मजबूरी अपनी लगाई आग में अब खुद को जला रहा हूं
18 घंटे पहले
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