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अंदाज़ ए रस्म ए उल्फत

                
                                                         
                            अपनी ही नाकामियों का जश्न मैं मना रहा हूं चल के अजनबी शहर के अजनबी राहों पर उलझनें अपनी बढ़ा रहा हूं
                                                                 
                            
ना रहा आसान कभी गिला तुमसे करना बढ़ा कर हम मुश्किलें अपनी ही होकर बर्बाद तुमसे अब फासला बढ़ा रहा हूं
सितम ये सामने आपके जिक्र अपनी मुफलिसी का कर सकता मैं नहीं गवां कर वक्त तेरे ही इंतजार में दर्द बढ़ा रहा हूं
करके भरोसा फिर भी किया अहसान मुझ पर कब सच तो है ये बगैर तेरी मर्जी के मिला सकूं कब सोच के घबरा रहा हूं
उदासियां भी अब चैन ओ सकूं से जीने हमें ना देगी बढ़ा कर मजबूरी अपनी लगाई आग में अब खुद को जला रहा हूं
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8 घंटे पहले

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