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चाँद के नीचे

Prateet Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            "चाँद के नीचे"
        
                                                    
                            

चाँद के नीचे न जाने
ये दीवाने क्यों खड़े हैं,
शायद अपने प्यार की
उल्फ़त-ओ-साए जानने में अड़े हैं।

बिखरी चाँद की चाँदनी अंधेरे में
अपने यार की रूह को जिस्म से मिला देगी,
ना मिला पाए... तो उसके नक्श को
ये चाँद अपनी सूरत में उसकी मूरत दिखा देगी।

प्यासा है यह 'फ़र्ज़हिंद' न जाने कब से,
कब मिलेगी उसकी एक झलक की चमक,
कब तलक बहलाए यह दिल-ओ-हसरत,
उसकी चाँद-ए-कल्पना की दमक।

 
एक महीने पहले
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