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कच्चे धागे का अटूट बंधन

Pooja Saini

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कलाई पर बँधा कच्चा-सा धागा,
        
                                                    
                            
जाने कितने वचन सँजोता है,
नाज़ुक दिखता है जग की नज़रों में,
पर जन्मों का रिश्ता पिरोता है।

लड़ते-झगड़ते बचपन में,
फिर पल भर में मुस्काते थे,
नन्ही-सी उन नोकझोंकों में,
प्रीत के दीप जलाते थे।

जब जीवन की राह कठिन हो,
मन भी कभी घबरा जाता है,
बहना का स्नेहिल आशीष
हर संकट से लड़ना सिखाता है।

एक दिन बहना को जाना है,
अपना आँगन पीछे छोड़कर,
पर भाई का स्नेह साथ रहता है,
हर दूरी को भी बाँधकर।

रोली-चंदन का वह तिलक
मान-सम्मान बढ़ाता है,
बहना की सच्ची दुआओँ से
भाई का जीवन मुस्काता है।

न सूनी रहे किसी भाई की कलाई,
न बहना का मन उदास रहे,
सुख-दुख की हर एक डगर पर
दोनों का अटूट विश्वास रहे।

न अपने-पराए का भेद यहाँ,
न जाति-पांत की कोई दीवार,
जो दिल से एक-दूजे के हो जाएँ,
वही बंधन होता है सबसे खास।

कच्चा धागा भले ही नाज़ुक हो,
पर इसकी डोर कभी कच्ची नहीं,
भाई-बहन का सच्चा यह बंधन,
दूर रहकर भी कभी जुदा नहीं।
एक महीने पहले
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