यार क्यूँ हम भी प्यार कर बैठे
दिल तुम्हीं पर निसार कर बैठे
कुछ न हासिल हुआ मोहब्बत में
दिल ही अपना फ़िगार कर बैठे
तुम पे कितना यकीं था हमको तो
झूठ पर ए'तिबार कर बैठे
तुम न अहद-ए-वफ़ा निभा पाए
दिल को हम बे-क़रार कर बैठे
ज़िन्दगी में कभी मिलेंगे फिर
सोच कर इंतिज़ार कर बैठे
रूठी है हमसे मौत भी शायद
ज़ीस्त को तार-तार कर बैठे
अब हक़ीक़त भी ख़्वाब लगती है
हर नफ़स सोगवार कर बैठे