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बेकल आँखें

Parul Bhaktani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तुमको ही ढूँढती  हर ओर हैं बेकल आँखें
        
                                                    
                            
जुस्तजू में तेरी ही बहती मुसलसल आँखे

आज भी यादें सुहानी बसी हैं आँखों में
रात भर सोने को तरसे हैं ये बोझल आँखें

हिज्र के ग़म को हमेशा छुपा कर रखा है
हाल दिल का बता देती हैं ये पागल आँखें

छोड़कर जाते जो, वो लौट कर आए हैं कब
तकती हैं राह सदा फिर भी तो घायल आँखें

ख़्वाबों में अपना मिलन होता रहेगा 'पारुल'
दौड़ते मेरे ख़याल और ना-मुकम्मल आँखें
2 महीने पहले
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