आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बेकल आँखें

                
                                                         
                            तुमको ही ढूँढती  हर ओर हैं बेकल आँखें
                                                                 
                            
जुस्तजू में तेरी ही बहती मुसलसल आँखे

आज भी यादें सुहानी बसी हैं आँखों में
रात भर सोने को तरसे हैं ये बोझल आँखें

हिज्र के ग़म को हमेशा छुपा कर रखा है
हाल दिल का बता देती हैं ये पागल आँखें

छोड़कर जाते जो, वो लौट कर आए हैं कब
तकती हैं राह सदा फिर भी तो घायल आँखें

ख़्वाबों में अपना मिलन होता रहेगा 'पारुल'
दौड़ते मेरे ख़याल और ना-मुकम्मल आँखें
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 hours ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर