तुमको ही ढूँढती हर ओर हैं बेकल आँखें
जुस्तजू में तेरी ही बहती मुसलसल आँखे
आज भी यादें सुहानी बसी हैं आँखों में
रात भर सोने को तरसे हैं ये बोझल आँखें
हिज्र के ग़म को हमेशा छुपा कर रखा है
हाल दिल का बता देती हैं ये पागल आँखें
छोड़कर जाते जो, वो लौट कर आए हैं कब
तकती हैं राह सदा फिर भी तो घायल आँखें
ख़्वाबों में अपना मिलन होता रहेगा 'पारुल'
दौड़ते मेरे ख़याल और ना-मुकम्मल आँखें
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