मैं कब से
घटनाओं की दिशा मोड़ना चाहता था,
मानो समय की नदी
मेरे संकेतों से बहती हो।
किन्तु जल ने सिखाया—
प्रवाह का अपना भी एक सत्य होता है।
जो घटित हुआ,
वह केवल संयोग नहीं था;
किसी अदृश्य क्रम की
मौन अभिव्यक्ति था।
मैंने विरोध किया,
और स्वयं ही अपने विरुद्ध खड़ा हो गया।
फिर एक दिन
मैंने प्रश्नों को विराम दिया।
उत्तर नहीं मिले,
पर भीतर का कोलाहल
धीरे-धीरे
एक गहरे मौन में उतर गया।
स्वीकार करना पराजय नहीं,
यह मैंने देर से जाना।
यह तो उस वृक्ष-सा होना है
जो आँधी को रोकता नहीं,
किन्तु झुककर भी
अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है।
अब मैं जानता हूँ—
धैर्य कोई प्रतीक्षा नहीं,
एक जाग्रत उपस्थिति है;
जहाँ मन
घटना के पार जाकर
उसके अर्थ को सुनता है।
जो आया है,
उसे आने देता हूँ;
जो चला गया,
उसे जाने देता हूँ।
शायद इसी सहजता में
आत्मा अपना प्रकाश पहचानती है।