अभिलाषा की उत्ताल लहरें
मन के सूने तट पर
जब टकराती हैं,
तब समय का मापदंड
छोटा पड़ जाता है,
और पिपासा
विस्तार पाती जाती है।
जिसको पाने की आतुरता में
रातें आंखों में कटीं,
वह उपलब्धि मिलते ही
एक नया क्षितिज
सामने तन जाता है;
दौड़ कभी नहीं रुकती,
सांसें घटने लगती हैं।
मन खोजता है एक स्पर्श,
एक निश्छल प्रेम,
एक ऐसा सहयात्री
जो शब्दहीनता को समझ सके,
जो मौन के अंतस में
छिपे हाहाकार को
सहजता से पढ़ ले।
संसार के इस अगाध सिंधु में
सत्य के मोती की चाह में,
चेतना बार-बार
गहरे उतरती है;
क्या कोई शाश्वत सत्ता है?
यह प्रश्न अनुत्तरित ही
हवा में तैरता रहता है।
जब-जब इस जीवन की
क्षणभंगुरता का बोध
हड्डियों तक को कंपाता है,
तब सारे भ्रम ढहते हैं,
एक शांत बोध जागता है...
और जीव स्वयं में
बुद्ध हो जाता है।