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संसार के इस अगाध सिंधु में

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अभिलाषा की उत्ताल लहरें
        
                                                    
                            
मन के सूने तट पर
जब टकराती हैं,
तब समय का मापदंड
छोटा पड़ जाता है,
और पिपासा
विस्तार पाती जाती है।

जिसको पाने की आतुरता में
रातें आंखों में कटीं,
वह उपलब्धि मिलते ही
एक नया क्षितिज
सामने तन जाता है;
दौड़ कभी नहीं रुकती,
सांसें घटने लगती हैं।

मन खोजता है एक स्पर्श,
एक निश्छल प्रेम,
एक ऐसा सहयात्री
जो शब्दहीनता को समझ सके,
जो मौन के अंतस में
छिपे हाहाकार को
सहजता से पढ़ ले।

संसार के इस अगाध सिंधु में
सत्य के मोती की चाह में,
चेतना बार-बार
गहरे उतरती है;
क्या कोई शाश्वत सत्ता है?
यह प्रश्न अनुत्तरित ही
हवा में तैरता रहता है।

जब-जब इस जीवन की
क्षणभंगुरता का बोध
हड्डियों तक को कंपाता है,
तब सारे भ्रम ढहते हैं,
एक शांत बोध जागता है...
और जीव स्वयं में
बुद्ध हो जाता है।
3 घंटे पहले
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