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अब न किसी के रुकने का आग्रह है

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक दिन जाना—
        
                                                    
                            
साथ का अर्थ
केवल साथ चलना नहीं होता।
कुछ हाथ
स्पर्श से पहले ही छूट जाते हैं;
तब पथ नहीं,
स्वयं को थामना पड़ता है।

मैंने संबंधों को
नामों में नहीं,
उनकी अनुगूँजों में परखा।
जहाँ सम्मान का स्वर क्षीण हुआ,
वहाँ मौन भी
अपनी भाषा बदल बैठा;
और उत्तर
भीतर की निस्तब्धता से उभरा।

कौन किसका है?
काल अब तक
इस प्रश्न का साक्षी है।
हम एक-दूसरे के जीवन में
क्षणिक आलोक हैं—
न अधिकार,
न आश्रय;
केवल एक-दूसरे से
गुज़रती हुई यात्राएँ।

तब जाना—
त्याग पराजय नहीं,
भ्रम के आवरणों का
धीरे-धीरे उतरना है।
विरक्ति कोई रिक्तता नहीं;
वह भीतर
जन्म लेता प्रकाश है।

जो चला गया,
वह केवल व्यक्ति नहीं था;
मेरी अपेक्षाओं का
एक दीर्घ स्वप्न भी था।
उसके विलय के बाद
कुछ टूटा नहीं—
केवल देखने की दृष्टि
कुछ और निर्मल हुई।

अब न किसी के रुकने का आग्रह है,
न किसी के जाने का शोक।
जो मिलता है,
वह भी पथ का प्रसंग है;
जो बिछुड़ता है,
वह भी उसी पथ की ध्वनि।
शेष क्या है?
यह प्रश्न अब भी मौन है।
और शायद—
मैं स्वयं भी
उस मौन का
अनुत्तरित प्रश्न हूँ।
2 घंटे पहले
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