अपने जीवन के पट पर मैं,
स्वप्निल रेखा स्वयं बनाऊँ।
अश्रु-कणों की नील स्याही से,
अंतर का आकाश सजाऊँ॥
जग ने जितने रंग दिए हैं,
सब मेरे अनुरूप न होंगे।
कुछ क्षणभंगुर धूलि-चित्र से,
कुछ चिर शांति-स्वरूप न होंगे॥
मैं चुन लूँगा वही छटाएँ,
जिनमें करुणा का जल बहता।
जिनकी मृदु आलोक-लहर में,
मन का निर्जन वन हँसता॥
क्यों भरूँ चित्रों में वह ज्वाला,
जो केवल दाह बढ़ाती है?
रंग वही शुभ, जो तम हरकर,
अंतर में प्रभात जगाती है॥
जीवन कोई रिक्त तख्ती नहीं,
भाग्य जहाँ सब लिख जाता है।
यह तो वह वीणा है, जिस पर
स्वर अपना ही झंकृत गाता है॥
पीड़ा भी एक रंग है गहरा,
जिससे चेतन रूप निखरता।
किन्तु वही दुःख वरण योग्य है,
जो मानव को मानव करता॥
जब मन अपने केंद्र पहुँचकर
मौन सिंधु में डूब जाता है,
तब सुख कोई वस्तु नहीं रह—
स्वयं प्रकाश बन जाता है॥
इसलिए, हे पथ के साधक,
तूलिका अपने हाथ धरो।
जीवन-चित्र अपूर्व रचो तुम,
और शांति के रंग भरो॥