आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जब मन अपने केंद्र पहुँचकर

                
                                                         
                            अपने जीवन के पट पर मैं,
                                                                 
                            
स्वप्निल रेखा स्वयं बनाऊँ।
अश्रु-कणों की नील स्याही से,
अंतर का आकाश सजाऊँ॥

जग ने जितने रंग दिए हैं,
सब मेरे अनुरूप न होंगे।
कुछ क्षणभंगुर धूलि-चित्र से,
कुछ चिर शांति-स्वरूप न होंगे॥

मैं चुन लूँगा वही छटाएँ,
जिनमें करुणा का जल बहता।
जिनकी मृदु आलोक-लहर में,
मन का निर्जन वन हँसता॥

क्यों भरूँ चित्रों में वह ज्वाला,
जो केवल दाह बढ़ाती है?
रंग वही शुभ, जो तम हरकर,
अंतर में प्रभात जगाती है॥

जीवन कोई रिक्त तख्ती नहीं,
भाग्य जहाँ सब लिख जाता है।
यह तो वह वीणा है, जिस पर
स्वर अपना ही झंकृत गाता है॥

पीड़ा भी एक रंग है गहरा,
जिससे चेतन रूप निखरता।
किन्तु वही दुःख वरण योग्य है,
जो मानव को मानव करता॥

जब मन अपने केंद्र पहुँचकर
मौन सिंधु में डूब जाता है,
तब सुख कोई वस्तु नहीं रह—
स्वयं प्रकाश बन जाता है॥

इसलिए, हे पथ के साधक,
तूलिका अपने हाथ धरो।
जीवन-चित्र अपूर्व रचो तुम,
और शांति के रंग भरो॥
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
11 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर