धुंधली सी इस बेला में,
मौन खड़ा है देखो काल।
लोह-स्तंभ पर पक्षी शांत,
अंतस में सच की मशाल।
क्षणभंगुर जीवन का रूप,
अद्भुत यह विरोधाभास।
एक तरफ ठहराव मौन,
दूजी ओर गति का अहसास।
धुंध-जाल में पीछे राही,
तीव्र वेग से बढ़ता है।
समय-प्रवाह सरीखा वह,
क्षण का सच ही गढ़ता है।
पर पक्षी में धीरज गहरा,
क्षण में ही अनंत संज्ञान।
कालचक्र की वेदी पर,
मूक गवाही का वरदान।
हम भी तो उस राही सम,
अविरल वेग में बहते हैं।
ठहरो, इस पल को समझो,
दुख-सुख जो भी सहते हैं।
गति और ठहराव के बीच,
सच्चा जीवन-दर्शन है।
थमकर इस पल को जी लो,
यही आत्म का अर्पण है।