आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

"गति और ठहराव"

                
                                                         
                            धुंधली सी इस बेला में,
                                                                 
                            
मौन खड़ा है देखो काल।
लोह-स्तंभ पर पक्षी शांत,
अंतस में सच की मशाल।

क्षणभंगुर जीवन का रूप,
अद्भुत यह विरोधाभास।
एक तरफ ठहराव मौन,
दूजी ओर गति का अहसास।

धुंध-जाल में पीछे राही,
तीव्र वेग से बढ़ता है।
समय-प्रवाह सरीखा वह,
क्षण का सच ही गढ़ता है।

पर पक्षी में धीरज गहरा,
क्षण में ही अनंत संज्ञान।
कालचक्र की वेदी पर,
मूक गवाही का वरदान।

हम भी तो उस राही सम,
अविरल वेग में बहते हैं।
ठहरो, इस पल को समझो,
दुख-सुख जो भी सहते हैं।

गति और ठहराव के बीच,
सच्चा जीवन-दर्शन है।
थमकर इस पल को जी लो,
यही आत्म का अर्पण है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर