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"देहरी का महाप्रस्थान"

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            माँ! न मानो मैं दूर हुई,
        
                                                    
                            
मैं जीवन की नव भोर हुई।
संस्कारों का दीप लिये,
तेरे आँचल की डोर हुई।।

परिणय-पथ पर चरण धरूँ,
स्वप्निल नव संसार गढ़ूँ।
प्रियतम का कर थामे आज,
दो कुल की मर्यादा पढ़ूँ।।

अधरों पर मुस्कान सजी,
पर अंतर पीड़ा से भीगी।
शैशव की हर मधुर स्मृति,
पलकों पर बन आई सीपी।।

यह देहरी, यह आँगन सारा,
हर कण मुझको पुकार रहा।
तुलसी चौरा, द्वार, अलिन्द,
मौन हृदय को निहार रहा।।

तात! नयन क्यों झुके हुए हैं?
क्यों स्वर सारे रुके हुए हैं?
जो पर्वत-से अटल खड़े थे,
आज अश्रु क्यों बहे हुए हैं?

माँ! क्यों मुख पर धैर्य धरे हो?
अंतर का संताप हरे हो।
हँसकर मुझको विदा कर रही,
स्वयं व्यथा का विष पिए हो।।

वह अनुज, चपलता का सागर,
आज बना क्यों मौन धरोहर?
जिसकी हँसी गूँजती रहती,
वह भी बन बैठा है पत्थर।।

वह भ्राता जो ढाल बना था,
हर संकट में साथ खड़ा था।
आज विदा की इस वेला में,
मूक वेदना स्वयं पढ़ा था।।

भाग्य-रेखाएँ जुड़ीं तुम्हीं से,
प्राण जुड़े हैं जन्म-जन्म से।
जहाँ रहूँ, तेरी ही छाया,
साथ रहे हर कर्म-धर्म से।।

माँ! आशीष अटल रखना तुम,
स्नेह-सुधा अविरल रखना तुम।
डगमग हो यदि जीवन-पथ पर,
विश्वास अमर संबल रखना तुम।।

मैं न विलग हूँ, रूप बदलकर,
तेरी ही प्रतिध्वनि बन जाऊँ।
एक कुल की बेटी थी अब तक,
दो कुल का विश्वास निभाऊँ।।

आज विदा है केवल तन की,
मन तो यहीं ठहर जाएगा।
देहरी का यह महाप्रस्थान,
मुझमें ही घर कर जाएगा।।
6 घंटे पहले
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