मैंने सोचा—
मैं ही अपने जीवन का लेखक हूँ।
फिर देखा—
मेरे शब्दों से पहले
कुछ मौन लिखे जा चुके थे।
जो खोया,
वह केवल अभाव नहीं था।
उसी ने भीतर
एक रिक्त पृष्ठ छोड़ा,
जहाँ पीड़ा ने
अपना प्रथम अक्षर लिखा।
धीरे-धीरे समझा—
संघर्ष घाव नहीं देता,
वह दृष्टि देता है।
जिस दिन आँसू अर्थ बने,
उसी दिन
स्वयं को पढ़ना सीखा।
हर बार भागना चाहा,
पर लौटकर
उसी अधूरे वाक्य तक आया,
जिसे समय नहीं,
अनुभव पूर्ण करता था।
तभी जाना—
मुझे घटनाएँ नहीं,
उनके भीतर छिपा मौन लिख रहा था।
अब प्रश्न यह नहीं—
जीवन ने मुझे क्या दिया।
प्रश्न केवल इतना है—
मेरे भीतर
कौन-सी पंक्ति
अब भी अनलिखी है?
और क्या
मेरा साहस
उसे लिखे जाने देगा?
अब समझता हूँ—
संघर्ष कोई घटना नहीं,
वह एक अदृश्य लेखक है।
वह स्याही से नहीं,
मौन से लिखता है।
जब शब्द
धीरे-धीरे विलीन हो जाते हैं,
तब ज्ञात होता है—
मैं लेखक नहीं था;
एक मौन ग्रंथ की तरह
निरंतर लिखा जा रहा था।