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बुझ गए सारे चिराग़

Pandit Chandradutt

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बुझ गए सारे चिराग़, जलती रहीं मसालें,
        
                                                    
                            
धधकती रही निरन्तर दिलों में ज्वाला।
बहुत हो चुका अब बदला लेने की ठानी,
संभाल रहे थे तलवारें बरछी और भाला।
जोशीले जियालों का कोई नहीं था सानी,
बिरतानियों का शेरों से पड़ गया था पाला।

चंद्र दत्त शर्मा 
2 महीने पहले
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