बुझ गए सारे चिराग़, जलती रहीं मसालें,
धधकती रही निरन्तर दिलों में ज्वाला।
बहुत हो चुका अब बदला लेने की ठानी,
संभाल रहे थे तलवारें बरछी और भाला।
जोशीले जियालों का कोई नहीं था सानी,
बिरतानियों का शेरों से पड़ गया था पाला।
चंद्र दत्त शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X