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ये चांद वो चांद

P R Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक चाँद आकाश पर है
        
                                                    
                            
और एक धरती पर
धरती के चाँद की उपमा
आकाश के चाँद से की जाती है
धरती के चाँद पर हज़ारों बंदिशें
घूंघट में रहने की बुरी नज़र की
अला बला की, और न जाने क्या क्या

आकाश के चाँद का दीदार दुनिया करती है
धरती के चाँद को छिप कर रहना पड़ता है

आकाश का चाँद तो सबका चहेता है
चाहे ईद हो या करवाचौथ
उसके लिए ऑंखें तरसती हैं
वह कवियों की कल्पना में है
बच्चों की आँखों का सपना सा है
वह नानी दादी की कहानियों में है
हर किसी को उसे पास से
देखने की चाहत है
पर अगर वो धरती पर उतर आता
तो धर्म मज़हब की लड़ाइयां होती
कोई कहता ये मेरा है और कोई कहता मेरा
वो सियासत का मुद्दा बन जाता
वो अख़बारों की सुर्ख़ियों में होता
वो हर समाचार का सिरमौर होता
यहाँ तक की अपना हक़ ज़माने को
उसे कोर्ट कचहरी में घसीटते

उसके लिए रोते चिल्लाते
अनशन करते जलूस निकालते
पर उसकी कल्पना मात्र ही कर सकते हैं
क्यूंकि वह मीलों दूर है धरती से
उस पर किसी का अधिकार नहीं है

वह स्वतंत्र है, स्वच्छंद है विचरण करने को
इस नीले आकाश में सदियों से
धरती के चाँद पर हैं साड़ी पाबंदियां
धरती के चाँद पर ही
इतिहास में लड़ाइयां लड़ी गयीं
चाहे वो द्रोपदी हो, रुक्मणी हो
सीता हो,अहिल्या हो या पद्मावती
ये लड़ाइयां यूँ ही लड़ी जाती रहेंगी
जब तक चाँद का आकर्षण बना रहेगा
और इंसान उसके पीछे यूँ ही पागल रहेगा
एक वर्ष पहले
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