चंदा मामा कहते सूरज दादा से कुछ तो धीर धरो
यह इन्सान ही है जो पूजता हमें ,इससे प्रेम करो
यह पेड़ पौधों की हरीयाली बढ़ी प्रेरणा देती है
इन्हें मत भस्म करो अग्नि मे, इनके माथे पर हाथ धरो
जब हनुमंत आये थे तुम्हारे पास सबकी सुन कर धीर धरा था
तुम्हारे और हनुमत के बीच फासला जरा था
प्रकृतिधरा पर निश्चित रह जाता सब धरा का धरा था
वसुधैव कुटुम्बकम ने रोका ,जीवन बना फिर हरा-भरा
मानव ने यह जाना ब्रम्हांड मे सुरज एवं अन्य ग्रह और भी हैं लेकिन वह खुद को नहीं जान पाया ,अपना अंतिम छोर
अपनी आखिरी कल्पना ढूंढने में मानवता अभी उलझी है
देवता भी इसके संपर्क में हैं
सभी कहते हैं यही एक हस्ती है भरोसा युक्त
जो लग रहा कुछ सुलझा सुलझा है ।