हाल-ए-दिल जरा तुम पूछ लेना,
मुझको तुम यूं दगा ना देना,
रुख़सत भी हम सह लेंगे,
गर गलती हो तुम सजा देना,
अपनी बातों में समा लेना,
मुझको दिल से ना फेंकना,
प्यार की माला में पिरोकर,
मुझे अपने समीप रखना,
तुमसे बस यही है कहना,
मुझपे जो संदेह कभी हो,
बेशक तुम मुझसे कहना।।
लाख खामियां मुझमें हो,
मुझको तुम संभालना,
एहसासों के सागर में,
डुबो के तुम मुझे रखना,
प्रेम का पर्दा गिरा के,
कभी धूल ना जमने देना,
रुक जाए जो पल में लम्हा,
आवाज तुम मुझको देना,
मुझपे जो संदेह कभी हो,
बेशक तुम मुझसे कहना।।
एक दीवार हक़ीकत का,
कभी ना धूमिल होने देना,
दो किनारों के साहिल हम,
जिसके बिन सागर प्यासा,
पहुँच मेरे तह तक तुम,
मुझको सराबोर कर देना,
प्रीत खिला के तरोवर में,
एक नई उमंग भर देना,
मुझपे जो संदेह कभी हो,
बेशक तुम मुझसे कहना।।
नेहा यादव
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।