कुछ बेहद की तलाश में निकल
तू कुछ नया कर
अपना आसमान नया बना
अपनी धरती नई बना
कुछ बेहद कर
तू अपने घर से निकल
तू कुछ पदचिह्न बना
सब आएँगे तेरे पदचिह्नों को नापते हुए
तू कुछ कर तो
कब तक डरेगा
एक दिन तो तुझे निकलना होगा
अपना काफिला बनाने के लिए
ताकि तुझे भी लोग
तेरी कला से पहचानें
तेरी भी मंज़िल तुझको मिलेगी
तू कुछ तो कर
समुंदर बनाने के लिए
पानी तो ला
इतिहास रचने के लिए वो रवानी तो ला
जवानी तो तेरी बीत जाएगी
तू कोई कहानी तो बना
कुछ सोच
कुछ नया कर
कुछ नए किस्से गढ़
आसमान के नीचे
तू धूप नदी में तो चल
सब चुनेंगे तेरे दाने
तू फ़सल तो लगा
तू अपना इतिहास तो रच
अब कुछ सोच मत, बस चल तू
अपने लक्ष्य के आगे बढ़ तू
तू रख हर मुद्दे को
अपनी कविता में
कुछ बेहद की तलाश में निकल
तू कुछ नया कर
अपना आसमान नया बना
अपनी धरती नई बना
कुछ बेहद कर
-नीलम चौरसिया “नील”