विज्ञापन

आख़िर जाना है कहाँ?

Mukesh Bissa

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मेरी मंज़िल है कहाँ
        
                                                    
                            

राहें बहुत हैं सामने,
पर दिल को पता नहीं,
चलता रहा हूँ उम्र भर,
मंज़िल का पता नहीं।

कभी धूप मिली,
कभी छाँव मिली,
कभी अपने मिले,
कभी तन्हाई मिली।

हर मोड़ पर खुद से पूछा—
आख़िर जाना है कहाँ?

फिर दिल ने धीरे से कहा—
जिस दिन खुद को पा लोगे,
समझ लेना उसी पल
मिल गई मंज़िल वहाँ।
7 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all