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आख़िर जाना है कहाँ?

                
                                                         
                            मेरी मंज़िल है कहाँ
                                                                 
                            

राहें बहुत हैं सामने,
पर दिल को पता नहीं,
चलता रहा हूँ उम्र भर,
मंज़िल का पता नहीं।

कभी धूप मिली,
कभी छाँव मिली,
कभी अपने मिले,
कभी तन्हाई मिली।

हर मोड़ पर खुद से पूछा—
आख़िर जाना है कहाँ?

फिर दिल ने धीरे से कहा—
जिस दिन खुद को पा लोगे,
समझ लेना उसी पल
मिल गई मंज़िल वहाँ।
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2 hours ago

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